जब किसी सरकार का ख़र्च उसके आय से अधिक हो जाए तो आय और व्यय के अंतर को राजकोषीय घाटा कहा जाता है. अंग्रेज़ी में इसे Fiscal Deficit ( फ़िस्कल डेफ़िसिट) कहते हैं.

आमतौर पर इसका आकलन हर वर्ष या हर वित्तीय वर्ष में किया जाता है.

उदाहरण के लिए यदि वर्ष २०१६ में भारत सरकार की कुल आय रु १००० करोड़ है (इसमें टैक्स, उत्पादन, कृषि और अन्य सेवाओं से की गयी आय शामिल है ) परंतु इसी वर्ष भारत सरकार को १२०० करोड़ रुपए का ख़र्च करना पड़ा ( उदाहरण के लिए तेल का आयात, रक्षा उपकरणों का आयात, पहले लिए गए ऋण, अन्य आंतरिक व्यय ) तो कुल राजकोषीय घाटा होगा

व्यय - आय = राजकोषीय घाटा १२००-१००० = २०० करोड़

इस घाटे को पूरा करने के सरकार केंद्रीय बैंक ( भारत में रिज़र्व बैंक ) से ऋण लेती है या फिर निवेश बाज़ार में बॉंड ( निवेश पत्र) जारी करती है.

राजकोषीय घाटा किसी भी देश की आर्थिक स्थिति को समझने में एक महत्वपूर्ण बिंदु है. यदि किसी देश का राजकोषीय घाटा बहुत अधिक है तो इसका असर उसकी महँगाई दर पर पड़ता है. इसकी वजह से अंतर्रष्ट्रिय मुद्रा बाज़ार में देश की मुद्रा के दाम घट सकते हैं. उदाहरण के लिए आपको एक अमेरिकी डॉलर के लिये कितने भारतीय रुपए देने होंगे, यह भी राजकोषीय घाटे से प्रभावित होता है. इसके कारण विदेशी निवेश भी प्रभावित होता है, जिसका सीधा असर नौकरियों पर पड़ता है.

राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण किसी भी सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिये.

05 Jan 2014 / admin